छिंदवाड़ा- मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, संस्कृति विभाग के तत्त्वावधान में ज़िला अदब गोशा छिंदवाड़ा द्वारा शुक्रवार, 23 अक्टूबर को शादी हॉल, हुसैन नगर, पुराना बैल बाज़ार में ‘सिलसिला एवं तलाश-ए-जौहर’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में नई साहित्यिक प्रतिभाओं को मंच प्रदान करने के साथ उर्दू शेरो-अदब में राष्ट्रीय चेतना के विविध आयामों पर चर्चा की गई।

कार्यक्रम के अंतर्गत दोपहर 2:30 बजे से शाम 4 बजे तक ‘तलाश-ए-जौहर’ का आयोजन हुआ, जिसमें दिए हुए मिसरे “दिल का दरवाज़ा मुस्कुराया है” और “किसी ने इतना तेरा इंतेज़ार देखा है” पर तात्कालिक शेर कहकर प्रतिभागियों को अपनी रचनात्मक क्षमता प्रदर्शित करने का अवसर मिला। इस प्रतियोगिता में अयाज़ ख़ान ने सबसे बेहतर शेर कहे। उनको मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी द्वारा प्रमाणपत्र के साथ सम्मान राशि से पुरस्कृत किया जाएगा।

प्रतियोगिता में निर्णायक के रूप में दीपशिखा सागर एवं अंजुमन मंसूरी ‘आरज़ू’ उपस्थित रहीं।

तलाशे जौहर प्रतियोगिता के पश्चात शाम 5 बजे से ‘सिलसिला’ कार्यक्रम आयोजित किया गया।

इस अवसर पर मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ. नुसरत मेहदी ने अपने संदेश में कहा कि उर्दू शेरो-अदब ने देशप्रेम, इंसानियत और राष्ट्रीय एकता की भावना को सदैव मज़बूत किया है। उन्होंने कहा कि अकादमी के ‘सिलसिला’ एवं ‘तलाश-ए-जौहर’ जैसे आयोजन साहित्य के संरक्षण-संवर्धन के साथ नई प्रतिभाओं को मंच देने और राष्ट्रीय चेतना एवं सामाजिक समरसता को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी उद्देश्य के अंतर्गत आज शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ के बलिदान पर चर्चा की जा रही है जिनका व्यक्तित्व हमारी साझा सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रप्रेम की प्रेरक मिसाल है।

मुख्य वक्ता दीपशिखा सागर ने कहा कि अमर क्रांतिकारी शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ का जीवन देशभक्ति, साहस और सांप्रदायिक सद्भाव की प्रेरक मिसाल है। रामप्रसाद बिस्मिल के साथ उनका संघर्ष और सर्वोच्च बलिदान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की साझा विरासत का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि उर्दू शेरो-अदब ने सदैव वतनपरस्ती, इंसानियत और राष्ट्रीय एकता के मूल्यों को स्वर दिया है। साहित्य का दायित्व नई पीढ़ी को इतिहास और राष्ट्रीय मूल्यों से जोड़ना भी है।

ज़िला समन्वयक मुबीन ख़ान ने कहा कि ‘सिलसिला एवं तलाश-ए-जौहर’ जैसे आयोजन स्थानीय साहित्यिक प्रतिभाओं को मंच प्रदान करने के साथ उर्दू भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे कार्यक्रम साहित्यिक परंपरा को समृद्ध करने और नई पीढ़ी को साहित्य एवं राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने का प्रभावी माध्यम हैं।

इस अवसर पर शायरों ने प्रस्तुत कीं देशप्रेम, इंसानियत और जीवन से जुड़ी रचनाएँ

दीपशिखा सागर ने पढ़ा,

रोज़ वो पूछता है आँखों में अश्कों का सबब,
रोज़ ही आंख में कचरा मेरे पड़ जाता है।

सैयद हामिद अली ‘हामिद’ ने कहा,

हमें ग़मों में भी आदत है मुस्कुराने की,
ख़ुशी के गीत मुसीबत में गुनगुनाने की।

चंदन अयोधी ‘अश्क’ ने उम्मीद और उजाले का संदेश देते हुए कहा,

स्याह रातों के मुक़द्दर में सवेरा तेरा,
बख़्श दे मेरी भी आँखों को उजाला तेरा।

अवधेश तिवारी ने धार्मिक सद्भाव की भावना को स्वर दिया,

या हो साहिब गुरुद्वारा, सबके जलते हुए दीप में,
एक ज्योति का है उजियारा।

विजयानंद दुबे ने सामाजिक पाखंड पर कटाक्ष करते हुए कहा,

वो औरों को कहे पाकीज़गी का रास्ता चुनना,
मगर दौलत के कीचड़ में वो भी तो हैं धँसे कितने।

ओमप्रकाश ‘नयन’ ने लेखनी की ताकत को इन शब्दों में व्यक्त किया,

लिख भई लिख ऐसा लिख डाल,
तेरी लेखनी दिखलाए नित नए कमाल।

अजमेरा ‘मयकश’ ने अपने अंदाज़ में कहा,

मिल रहे हैं बड़ी शफ़क़त से,
क्या कोई काम पड़ गया मुझसे।

यूनुस शेख़ ने दुआओं के असर को कुछ यूँ बयाँ किया,

इनायत हो रही है अब उधर से,
दुआओं का असर होने लगा है।

अंजुमन मंसूरी ‘आरज़ू’ ने रिश्तों और नज़रिए की बदलती तस्वीर प्रस्तुत की,

हम पे नज़रें थीं कभी जिनकी सवालों की तरह,
देखते हैं वही अब हमको मिसालों की तरह।

अमित सोनी ने उम्मीद का इज़हार किया,

मेरी ख़्वाहिश यक़ीनन होगी पूरी,
कोई टूटा है तारा आसमाँ से।

स्वर्णा शेखर ने आत्ममंथन का आह्वान किया,

बीनाई में अपनी वो असर क्यों नहीं आता,
ऊँचाइयों का ऐब नज़र क्यों नहीं आता।

शारिक़ ‘साहिल’ ने वतन से मोहब्बत का इज़हार करते हुए कहा,

उन्हें कोई भी अंदाज़ा नहीं है,
हमें जो इश्क़ है हिंदोस्ताँ से।

तरुण जैन ने समकालीन सामाजिक परिस्थितियों पर व्यंग्य करते हुए कहा,

मौन के नारे शोर मचा रहे हैं,
न्याय के इशारे ही चोर बना रहे हैं,
जाएँ तो आख़िर किस डॉक्टर के पास जाएँ,
ताक़त के कैप्सूल ही कमज़ोर बना रहे हैं।

ओमप्रकाश ‘राकेश’ ने कहा,

आह लब पर मचल सी जाती है,
ख़ार जब-जब गुलाब होते हैं।

अनुराधा तिवारी ने सांप्रदायिक सद्भाव और मानवीय रिश्तों की सुंदर अभिव्यक्ति की,

धर्म, जाति, भाषा से ऊपर दिल का रिश्ता प्यारा है,
तेरा रब मेरा ईश्वर है, भगवान मेरा तुम्हारा है।

वहीं मुबीन ‘ज़ामिन’ ने जीवन में सादगी के महत्व को इन शब्दों में व्यक्त किया,

लुट गया ऐशो-तरब में मालो-ज़र, इज़्ज़त-वक़ार,
अब हमारी ज़िंदगी में सादगी आई तो क्या।

कार्यक्रम के अंत मे मुबीन ख़ान द्वारा सभी के प्रति आभार व्यक्त किया गया।