मध्यप्रदेश के भीम बैठका, सांची और गुजरात की रानी की वाव जैसे विश्व धरोहर स्थलों के संरक्षण एवं रायसेन में ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया की खोज में बहुमूल्य योगदान के लिए राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री से सम्मानित प्रख्यात पुरातत्वविद डॉ. नारायण व्यास से प्रोफेसर डॉ. अरुण कुमार खोबरे की खास बातचीत।

प्रश्न: देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक पद्मश्री मिलने के बाद कैसा लग रहा है?
उत्तर: मुझे बहुत अच्छा लग रहा है कि मुझे बहुत बड़ा सम्मान मिला है।
प्रश्न: सम्मान मिलने के बाद क्या बदलाव महसूस करते हैं?
उत्तर : किसी प्रकार का कोई बदलाव नहीं हुआ है। जैसा पहले था वैसा ही हूं।
प्रश्न: आपकी शिक्षा दीक्षा कहां से हुई और पुरातत्व के प्रति रुझान कैसे बड़ा?
उत्तर: मेरी शिक्षा एम ए तक उज्जैन में हुई। 1970 में मैंने प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति में एम ए किया।1972 में दिल्ली से स्कूल आफ आर्क्यैलाजी से पी जी डिप्लोमा पुरातत्व में किया। 1992 में रानी की वाव पाटन गुजरात पर पीएच.डी की तथा 2005 में शैल चित्रों पर भोपाल में डी.लिट की डिग्री ली।
प्रश्न: पुरातत्व में अपना जीवन समर्पित करने से पहले भी आपने कहीं नौकरी की है क्या ?
उत्तर : भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग में आने से पहले एडहाक पर एलआईसी तथा स्टेंट बेंक आफ इंडिया में सर्विस की।

प्रश्न: अपने जीवन का टर्निंग प्वाइंट आप किस व्यक्ति या घटना को मानते हैं?
उत्तर: मुझे पुरातत्व एवं इतिहास के प्रति डॉ. वाकणकर जी के संपर्क में आने के बाद बहुत लगाव हुआ। एलआईसी एवं बैंक के काम छोड़कर पुरातत्व के क्षेत्र में आया। डिप्लोमा होने के पश्चात मुझे वाकणकर जी ने भीमबैठका में उनके साथ काम करने को कहा। पुरातत्व से लगाव होने के कारण मैंने उनके सानिध्य में काम प्रारंभ किया। उनके साथ लगभग 10 किलोमीटर का पुरातत्त्वीय सर्वेक्षण किया जिसमें लगभग 500 से अधिक चित्रित शैलाश्रय थे।
प्रश्न: सेवानिवृत्त के बाद जहां ज्यादातर लोग आराम करना पसंद करते हैं। वहीं जीवन की इस दूसरी पारी को आप कैसे खेलेंगे, क्या सोचा आपने?
उत्तर: सभी का अपना अपना स्वभाव होता है। सेवानिवृत्त होने के बाद अगले दिन से पुरातत्व के क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से काम करने लगा, बहुत नयी नयी खोज की। जिनमें विभिन्न प्रकार के पुरावशेष है। विद्यार्थियों , शोधार्थियों एवं अन्य लोगों में पुरातत्व एवं धरोहर के प्रति विभिन्न प्रकार के माध्यम से जागरूकता पैदा करने में कार्य करने लगा ।
प्रश्न : पुरातत्व एवं धरोहर से संबंधित प्रदर्शनी अब तक कहां कहां लगा चुके हैं?
उत्तर: धरोहर के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए कई जगह प्रदर्शनियां लगाई जिनमें भोपाल,कोलार, खजुराहो के स्कूल कालेज, उज्जैन, इंदौर, मांडव, भीमबैठका, सांची, नर्मदापुरम, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र दिल्ली में दो बार, इत्यादि स्थानों पर लगभग 50 से अधिक प्रदर्शनियां लगाई, जिसका बहुत असर हुआ। इसके साथ ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की पवित्र मिट्टी की प्रदर्शनियां,इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की, के अन्तर्गत लगाई।
प्रश्न: प्रदर्शनी में क्या क्या खास चीजे है ?
उत्तर: प्रदर्शनी में पुरातत्व संबंधित सामग्री जैसे आदिमानव द्वारा निर्मित पत्थर के हथियार, मिट्टी के पात्र, सिक्के, पुराने पात्र, पुरानी पुस्तकें, समाचार पत्र, ऐतिहासिक डाक टिकट इत्यादि।
प्रश्न: आपको अब तक कहां कहां से कौन कौन से बड़े सम्मान प्राप्त हो चुके हैं?
मुझे कई सम्मान मिले हैं जिसमें पुरातत्व के क्षेत्र का मध्यप्रदेश शासन द्वारा राष्ट्रीय वाकणकर सम्मान दिया। चित्रकला के क्षेत्र में भी मिले, लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी नाम दर्ज हुआ है। इसके अतिरिक्त कई सम्मान मिले हैं।
प्रश्न: अब आपको पद्मश्री मिल गया है, निश्चित तौर पर जिम्मेदारी बड़ गई है। समाज और राष्ट्र के लिए क्या करने की इच्छा है?
उत्तर: पद्मश्री मिलने के पश्चात मुझे बहुत बड़ी जिम्मेदारी निभाना है। धरोहर के प्रति जागरूकता पैदा करने का काम पहले ज्यादा करना होगा जिसके लिए मेरी नैतिक जिम्मेदारी है। इस प्रकार के काम करने में मेरी पत्नी साधना व्यास की अहम् भूमिका है। वह भी मेरे साथ पुरातत्ववेत्ता होने के कारण सहयोग करती है।
प्रश्न: आज के अधिकांश युवा मोबाईल और रील्स में डूबे हुए हैं । पुरातत्व को लेकर उनके लिए आपका क्या संदेश है?
उत्तर: युवाओं एवं नयी पीढ़ी को यही संदेश है कि हमारी धरोहर जो पूर्वजों द्वारा दी गई है। उनके प्रति जागरूक रहना है ताकि भावी पीढ़ी इससे लाभान्वित हो सकें। हमारा कोई भी विषय हो परंतु हमारी सबकी धरोहर एक है।







