प्रिया कुमारी

खबर मध्यप्रदेश डेस्क – लोकपाल को बनाने का उद्देश्य भ्रष्टाचार को रोकना था लेकिन लगता है कि लोकपाल स्वयं अपने कार्यो से सवालों के कटघरे में खड़ा है ।भ्रष्टाचार की निगरानी करने वाली संस्था लोकपाल एक बार फिर सुर्खियों में है लेकिन इस बार कारण आंदोलन नहीं , ना ही कोई भ्रष्टाचारियों के ऊपर की कार्यवाही है बल्कि BMW 3 सीरीज की कार है।

भारत के लोकपाल ऑफिस ने 16 अक्टूबर 2025 को 7 BMW कार खरीदने के लिए एक टेंडर निकाला । यह कर लोकपाल के अध्यक्ष और सदस्यों के लिए है यह टेंडर में बताया गया कि BMW 3 सीरीज की 330Li Sports मॉडल की लंबी व्हीलबेस वाली सफेद कार्य खरीदी जाएंगी। प्रत्येक कर की कीमत 70 लाख से ज्यादा है तो कुल 7 कारो की कीमत लगभग 5 करोड रुपए से अधिक होने की उम्मीद है । जो भी कंपनी इस टेंडर में इक्छुक है उन्हें 6 नवंबर तक अपने प्रस्ताव जमा करने हैं तथा 7 नवंबर से बोली शुरू होगी । इसके अलावा टेंडर जानी होने के दो सप्ताह मे और अधिकतम 30 दिनों के अंदर कारों की डिलीवरी करनी है। इसके अलावा कार डिलीवर करने वाली कंपनी को लोकपाल के ड्राइवर और स्टाफ को 7 दिनों की ट्रेनिंग देनी होगी जिसमें उन्हें गाड़ी के रख रखाव सिस्टम और उससे जुड़ी सारी बातों की जानकारी देनी होगी ।
इन शर्तों के साथ जैसे ही टेंडर सार्वजनिक हुआ तो सभी सोशल मीडिया और विपक्षी पार्टियों के नेताओ ने भी इसके ऊपर कटाक्ष करना शुरू कर दिया । भ्रष्टाचार निदान करने वाली संस्था स्वयं ही इतनी महंगी गाड़ी क्यों खरीद रही है ?
जनता के पैसा का दुरुपयोग क्यों ?
नीति आयोग के ceo रहे अमिताभ कांत ने लोकपाल के लग्जरी कार खरीद टेंडर पर सवाल उठाया है। उन्होंने इसे रद्द कर मेक इन इंडिया इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने की सलाह दी है। लोकपाल करीब 5 करोड़ की सात BMW कारें खरीद रहा है, जबकि कांत ने महिंद्रा और टाटा की टॉप क्लास इलेक्ट्रिक गाड़ियों का सुझाव दिया है।
ऐसा कहा गया कि लोकपाल के चेयरपर्सन की वेतन भत्ता और सेवा शर्तें भारत के चीफ जस्टिस जैसी होती है तथा सदस्यों की वेतन भत्ता और सेवा शर्ते सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों जैसी होती है यो इसमे गलत क्या है ?
लेकिन सोचने की बात ये है कि आखिर काम सिर्फ BMW कार हो तभी किया जाएगा और यदि भारत सरकार के कर्मचारी स्वयं make in india की कार या अन्य उत्पाद नही खरीदेगी तो make in india या स्वदेशी अपनाओ का क्या मतलब ?
ये सिर्फ आम लोगो को दिखाने और बताने के लिए है जबकि भारत सरकार के कर्मचारी स्वयं इसका पालन नही करते।
केंद्र सरकार को इसके लिए भी कोई guideline तय करनी चाहिए ताकि जनता के पैसों का दुरुपयोग ना हो सके ।







